IPS Dr. Varun Kapoor: जहां जांच की उम्मीद खत्म, वहां से शुरू होती है वरुण कपूर की पड़ताल

IPS Dr. Varun Kapoor: मध्य प्रदेश कैडर के 1991 बैच के वरिष्ठ IPS अधिकारी और जेल विभाग के महानिदेशक डीजी डॉ. वरुण कपूर ने एक दैनिक समाचार पत्र स्वदेश से खास बातचीत की। IPS डॉ. वरुण कपूर प्रदेश और दुनिया को वो चेहरा हैं, जिन्हें बंद फाइलों का शिकारी, ब्लाइंड मर्डर का मास्टर माइंड माना जाता है। जहां जांच की उम्मीद खत्म हो जाती है, वहां से उनकी पड़ताल शुरू होती है। सालों पुराने अंधे कत्ल की गुत्थी सुलझाने वाले, बंद फाइलों और अपराधियों तक पहुंचने का हुनर रखने वाले, UN मिशन से ब्लाइंड मर्डर तक IPS डॉ. वरुण कपूर की वो अनसुनी कहानी, जो उन्होंने खुद अपनी जुबां से बताई और बदलते दौर में साइबर अपराध से निपटने की चुनौती कितनी बड़ी है।
कौन हैं IPS डॉ. वरुण कपूर?
सबसे पहले जान लेते हैं कि आखिर IPS डॉ. वरुण कपूर हैं कौन? IPS डॉ. वरुण कपूर 1991 बैच के IPS अधिकारी हैं। वे वर्तमान में मध्य प्रदेश जेल विभाग के महानिदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। तीन दशक से अधिक लंबे अपने पुलिस सेवा करियर में उन्होंने कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की जिम्मेदारियों को दमदारी के साथ संभाला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और संयुक्त राष्ट्र के अभियानों में अपनी अहम भूमिका निभाई। बोस्निया और जॉर्जिया में संयुक्त राष्ट्र अभियानों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने अपनी क्षमता का परिचय भी दिया।
इतना ही नहीं, IPS डॉ. वरुण कपूर की साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में जागरूकता फैलाने की उनकी पहल भी उल्लेखनीय रही है। देश के करीब 28 राज्यों में साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाने का उनका कार्य वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। डॉ. वरुण कपूर की सबसे अलग पहचान उन ब्लाइंड मर्डर केसों की बंद फाइलों को खोलने की है, जिनकी जांच सालों पहले ठंडे बस्ते में चली गई थी। ऐसे कई मामलों को उन्होंने दोबारा खुलवाया, पुराने सुरागों और उपलब्ध साक्ष्यों को नए नजरिए से देखा और अपराधियों तक पहुंचने में सफलता हासिल की। उनकी पैनी नजर उन कड़ियों को भी तलाश लेती है, जो समय के साथ धुंधली पड़ चुकी होती हैं।
सवाल: पुलिस सेवाओं के दौरान ऐसा कोई वाक्या, जो लोगों के रोंगटे खड़े कर दे।
जवाब: मैं पुलिस अधिकारी हूं, पुलिस अधिकारी की नौकरी ऐसी होती है कि हमारे सामने कई ऐसी चुनौतियां, कई ऐसे मौके आते हैं, जो बहुत खतरनाक भी होते हैं, चुनौतियां भी होती हैं, कई ऐसे मामले होते हैं, जो याद भी रह जाते हैं। मर्डर एक ऐसा केस होता है, जिसे हमें संवेदनशीलता के साथ सॉल्व करना होता है। मेरी नौकरी की शुरुआत में जब मैं इंदौर सिटी एसपी था, तब एक ऐसा प्रकरण आया था, जो आज भी मुझे याद है। जिस पर मैं एक किताब भी लिख रहा हूं। एक व्यक्ति मुझे फोन करता था, उस समय मोबाइल का जमाना नहीं था। वो मुझे लैंडलाइन पर फोन करता था। वो मुझे फोन पर बोलता था कि मुझे आपको कुछ बताना है। वो कहता था कि मैं डरता हूं आपके पास आने के लिए। मैंने उससे कहा कि क्या बात है, आप क्या बताना चाहते हैं? तो उसने कहा कि मुझे एक हत्या के बारे में जानकारी है, जिसे मैं आपको बताना चाहता हूं। मैं उसे हर बार यही बोलता था कि आप आओ और मुझे बताओ, मेरे हाथ में जो भी स्तर की कार्रवाई होगी, वो मैं करूंगा, लेकिन वो आता नहीं था। वो हर दूसरे और तीसरे दिन फोन जरूर करता था।
IPS कपूर ने आगे बताया कि करीब एक महीने बाद उसका फिर फोन आया। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर व्यस्त था। उसने बताया कि मुझे रात को नींद नहीं आती, मैं बहुत परेशान रहता हूं। तब मैंने उससे कहा कि तुम मुझे बार-बार फोन करते हो, बुलाने पर आते नहीं हो, तुम मुझे आकर पूरी बात बताओ, नहीं तो मुझे फिर फोन नहीं करना। इतना कहकर मैंने फोन रख दिया। अगले दिन जब मैं अपने दफ्तर में बैठा था, तो उसी दौरान एक पर्ची आई, उसमें उसका नाम लिखा था। उसका नाम मुझे आज भी याद है। उसका नाम था सपन शर्मा। मैंने उसे तुरंत अंदर बुलाया। IPS कपूर ने आगे बताया कि उस शख्स ने मुझे एक ऐसी कहानी सुनाई, जो रोंगटे खड़े करती है। बात यह थी कि एक व्यक्ति की शादी एक महिला से हुई थी। वो महिला बड़वाह की रहने वाली थी। उसकी अपनी वाइफ से बनती नहीं थी, जिसके कारण उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी। उसके दो बच्चे थे, वो पति के साथ थे। पति के बार-बार बुलाने पर भी वो वापस नहीं आती थी। कहानी का अंत वहां खत्म होता है कि उसने तलाश के लिए केस लगाया, क्योंकि उसने दूसरी शादी कर ली थी। शख्स ने पहली पत्नी को इमोशनल करके यह कहकर अपने घर बुलाया कि अपने बच्चों से मिल लो। उसके बाद जब महिला चली गई तो उसने अपने एक साथी के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी और उसे अपने घर के पीछे आंगन में दफना दिया।
IPS कपूर ने रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी को आगे बताते हुए बताया कि जब महिला नहीं मिली तो उसके दोनों भाई उसे ढूंढते आए और पुलिस में शिकायत की। उस समय 365 धारा होती थी, अपहरण की, उसमें मामला दर्ज किया गया। मामले की विवेचना भी हुई, लेकिन महिला का शव नहीं मिला और वो केस बंद हो गया। पांच साल बाद उस व्यक्ति ने मुझे पूरी बात बताई। इसके बाद हमने आरोपी को सेंधवा से गिरफ्तार किया और उसे इंदौर लेकर आए। उसके निशानदेही पर हमने घर के आंगन की खुदाई कराई और महिला का कंकाल बरामद किया। मुझे उसी केस से प्रेरणा मिली कि पुराने मामलों को भी खोलकर खुलासा करना बहुत जरूरी है।
सवाल: आपने 100 से ज्यादा पुराने केसों को रि-ओपन किया और कैसे किया?
जवाब: IPS कपूर ने आगे बताया कि जब महिला की हत्या का खुलासा हुआ तो उसके भाई मुझसे मिलने आए थे। वे मेरे पैर पकड़कर रो रहे थे और कह रहे थे कि आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, जो आपने पांच साल पुराने केस को खोला और हमारी बहन को न्याय दिलाया। अब हम अपनी बहन के अवशेषों का अंतिम संस्कार कर सकेंगे और उसकी आत्मा को शांति मिल सकेगी। IPS कपूर ने कहा कि इसी के बाद से मुझे प्रेरणा मिली कि यह एक पुनीत कार्य है। इसके बाद मैं जहां भी पदस्थ रहता था, वहां एक टीम बनाकर पुराने बंद मामलों को खोलकर उन्हें सॉल्व करने के लिए एक टारगेट देता था। ऐसे करते-करते कड़ियों से कड़ियां मिलीं और बंद पुराने मामले खुलते गए। ऐसे मामलों का खुलासा करना मुश्किल होता था, लेकिन फिर भी हम 110 मामलों का खुलासा कर चुके हैं, जो एक वर्ल्ड रिकॉर्ड बन चुका है।
सवाल: चुनौतियां तो बहुत होती होंगी? कैसे आपने ऐसे केसों को सुलझाया?
जवाब: ऐसे केसों को कोल्ड केस बोलते हैं। जब कोई घटना घटित होती है, घटना स्थल पर जाया जाता है, गवाह होते हैं, सबूत मिलते हैं, लेकिन कई सालों बाद ये सब ठंडे पड़ जाते हैं। घटनास्थल पर तो कोई सबूत नहीं मिलने होते हैं। कोई गवाह भी सामने नहीं आता है, ऐसे में पुराने केसों को सुलझाना चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन जब भी मैं जहां पदस्थ होता था, तो मुझे पत्र आते थे, फोन आते थे कि हमारे भाई का, हमारे अपनों का केस सुलझा दीजिए। उनके द्वारा बताए पॉइंट से और हमारी टीम की मेहनत से हम अपराधियों तक पहुंचे थे। मैं खुद एक-एक केस को देखता था।
सवाल: देश के कई अपराधों की जांच में पुलिस की लापरवाही की खबरें सामने आईं, क्या कमी रह जाती है?
जवाब: केस छोटा हो या बड़ा हो, उसे उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए, लेकिन कह दिया कि पुलिस की गलती से हुआ, यह मैं नहीं मानता हूं। परिस्थितियां कभी-कभी ऐसी बनती हैं, जिसमें कुछ चीजें छूट जाती हैं। हो सकता है समय का दबाव हो, कभी-कभी मीडिया का भी दबाव होता है, सोशल मीडिया का भी दबाव है। जैसे ही केस रजिस्टर्ड होता है तो लोग गिरफ्तारी की बात करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि पहले मामला दर्ज होता है, जांच होती है, इसके बाद गिरफ्तारी होती है, लेकिन कभी-कभी ऐसी अपेक्षा हो जाती है कि पहले गिरफ्तारी करो, वो गलत क्रम हो जाता है। ऐसे में कभी-कभी गलतियां हो जाती हैं, कुछ चीजें छूट जाती हैं। मैं इतना कह सकता हूं कि किसी भी मामले में पुलिस अधिकारी जानबूझकर गलतियां नहीं करता।
सवाल: कभी केस सुलझाने के दौरान आपका सामना अचानक किसी अपराधी से हुआ हो और वो पसीना-पसीना हो गया हो…
जवाब: अपराधी अपराधी होता है, वो कितना भी शातिर हो, उसके अंदर डर और भय हमेशा रहता है। ऐसा मेरे साथ कई मामलों में हुआ है। एक इंदौर का केस था। एक व्यक्ति ने अपनी मंगेतर की हत्या की थी और अपने आप को चोट पहुंचाकर वो अस्पताल में भर्ती था, यह दिखाने के लिए कि हम दोनों पर हमला हुआ है। जब मैं उससे पूछताछ करने गया तो उसने बताया कि उसे किसी ने पत्थर मारा और मैं नीचे गिर गया। उसके बाद घटनाक्रम हुआ। मैंने देखा कि उसके सिर में घाव था, वो एक सूजन थी। सूजन तब आती है जब आप किसी पत्थर पर अपना सिर मारें। अगर कोई पत्थर मारता है तो घाव अंदर की ओर होता है। उस समय मैं समझ गया कि वो झूठ बोल रहा है। मैंने उससे कहा कि तुमको पत्थर मारा या फिर तुमने अपना सिर पत्थर पर मारा। इतना कहते ही वो हैरान होकर पसीना-पसीना हो गया।
सवाल: जेल की सलाखों की भी एक दुनिया है। जेलों में भी कई रैकेट चलने की खबरें आई हैं। उसके लिए आपके प्रयास क्या हैं?
जवाब: जेल एक अलग ही दुनिया है। जेल के पीछे की इतनी जानकारी मुझे भी नहीं थी। मैं पुलिस अधिकारी के रूप में, एसपी के रूप में, डीआईजी के रूप में गया था कभी जेल। लेकिन लोगों के मन में जो भ्रांतियां होती हैं कि जेल खतरनाक होती है, जहां यातनाएं दी जाती हैं, लोगों को परेशानियां होती हैं, टॉर्चर किया जाता है, अंदर बहुत गंदगी होती है। ऐसी एक भावना सभी के मन में होती है। मुझे भी यही भावना थी, लेकिन ऐसा नहीं है। ये एक ऐसी पिक्चर है, जो सही बिल्कुल नहीं है। जेल एक ऐसी जगह है जहां पर दीवार तो है, लेकिन सबसे स्वच्छ जगह अगर कोई है तो वो जेल है। एक उदाहरण ले लीजिए, एक छोटा शहर है गंजबासौदा, जहां की कोई कॉलोनी, सड़क या एरिया साफ-सुथरा नहीं होता, जितना वहां की जेल के अंदर की साफ-सफाई है। आप कहीं भी चले जाएं, आपको जेल में साफ-सफाई मिलेगी। गार्डन मिलेंगे। कई जेलों में आपको खेती भी मिलेगी, उद्योग मिलेंगे। ऐसा कुछ भी नहीं है जैसा लोग सोचते हैं।
सवाल: कई बार खबरें आईं कि जेल के अंदर से सामान, अवैध वस्तुएं बरामद हुए, इससे कैसे सामना करेंगे आप?
जवाब: प्रयास और उसमें सफलता एक निरंतर प्रक्रिया होती है। कई चीजों में हम सुधार के प्रयास करते रहते हैं। कमियां जरूर आती हैं, लेकिन हम उस कमी को भी दूर करने का प्रयास करते हैं। अवैध सामग्री जाना एक समस्या है। जेल के अंदर अवैध सामग्री कैसे आएगी? या तो जेल के अंदर जाने वाला लेकर आएगा या फिर जो हमारे कर्मचारी होते हैं, वे लेकर आएंगे। सबसे बड़ी समस्या होती है जेल की दीवार, जिसके ऊपर से लोग फेंकते हैं। कई जेल हमारे शहरों के अंदर हैं, जो आसपास की घनी आबादी में हैं, तो लोग उसके ऊपर से फेंकते हैं। हम पूरे प्रयास करते हैं कि उसको रोकें। हां, जो लोग पकड़े जाते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई भी हम करते हैं। लेकिन प्रदेश में ऐसी कोई जेल नहीं है, जहां कोई अपराधी अंदर से गैंग चला रहा हो। मेरी संज्ञान में अब तक कोई जेल नहीं है और हम इसको होने भी नहीं देंगे।
सवाल: आपको साइबर एक्सपर्ट के रूप में जाना जाता है, साइबर क्राइम से निपटने का तरीका बताएं…
जवाब: मैंने इस पर 15 साल काम किया, लेकिन मैं साइबर में कभी पदस्थ नहीं रहा। यह मैंने वायचांस शुरू किया था। मैं एक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में पदस्थ हुआ, ये मेरा काम नहीं था, लेकिन मैंने सोचा कि चलो, ये करके देखते हैं। तब मैंने एक छोटा सा प्रोग्राम डिजाइन किया। जो ईमेल ट्रेसिंग था। हमने उसे अच्छे से संपादित किया। जिसके बाद वो इतना बड़ा रूप ले गया कि वो अब चलन में आ गया है। इसमें मेरे कई रिकॉर्ड हैं। इसमें हजारों सेशन कई देशों में दिए हैं। बोलने के लिए बहुत है, लेकिन छोटे से समय में आपको नहीं बता सकता।
IPS कपूर ने आगे कहा कि एक बात जरूर मैं बताना चाहूंगा कि मैंने 5 बड़े देशों में काम किया है। दुनिया में आज के समय में सबसे बड़ा खतरा है तो वो है सिटीजन सिक्योरिटी। सिक्योरिटी कई तरह की होती है। एक व्यक्ति की सुरक्षा, जिसे पुलिस देती है। इस समय सबसे खतरा क्या है तो वो है साइबर सुरक्षा का खतरा। क्योंकि इसमें खतरा दिखता नहीं, साइबर की दुनिया में कोई चाकू लेकर नहीं आएगा लूटने के लिए, लेकिन आप उससे बुरी तरह लूट जाओगे, आपको पता भी नहीं चलेगा। कोई कट्टे से फायर करके आपकी जान नहीं लेने वाला, लेकिन आपकी जान तक चली जाएगी, लेकिन पता नहीं चलेगा कि क्या हो गया। इसलिए मैं हमेशा बोलता हूं कि साइबर क्राइम से लड़ने के लिए आपको अपनी मानसिकता बदलनी पड़ेगी। असली दुनिया की मानसिकता अलग रखनी पड़ेगी और डिजिटल दुनिया के लिए अलग मानसिकता बनानी पड़ेगी। अगर आपको अपनी मानसिकता को बदलना है तो जागरूकता से बदलना है। क्योंकि जागरूकता ही एक चाबी है साइबर सुरक्षा की। जितने जागरूक रहोगे, उतने सुरक्षित रहोगे।
सवाल: जब पुलिस अपराधियों तक पहुंचती है तो कई बार उनके हमले झेलने पड़ते हैं, कई बार पुलिस वहां नहीं जाती है? कैसे निपटते हैं आप…
जवाब: अपराधियों को पकड़ने जाना और हमले होना कई बार होता है और हो सकता है, साइबर क्राइम में भी और दूसरे अपराधों में भी। कई बार पुलिस को विरोध का सामना करना पड़ जाता है, लेकिन उसकी कोई समस्या नहीं है, जहां भी जाओ पूरी सुरक्षा के साथ जाना चाहिए, लेकिन सबसे अहम होता है अपराधियों को ट्रेस करना। कभी-कभी जो सिम होती है, वो एक फेक सिम होती है। फर्जी नाम से दर्ज होती है। जब भी आप उस पते पर जाएंगे, तब भी आपको वो व्यक्ति वहां नहीं मिलेगा। इसलिए उसे ट्रेस करना और सही लोकेशन पर जाना एक चैलेंज है। ऐसे ही बैंक अकाउंट हैं, जो फर्जी होते हैं। इसके लिए ऐसे अपराधों के लिए अलग मॉडल अपनाना पड़ेगा। ऐसे में कभी-कभी सामना करना एक चुनौती हो जाता है।
सवाल: ऐसा कोई प्लेटफॉर्म नहीं, जहां पर देश की पुलिस एक साथ ऐसे अपराधों के खिलाफ काम कर सके?
जवाब: हां, ऐसे कई सारे नेटवर्क हैं, जहां पर पुलिस कोलैबोरेट करती है सभी राज्यों की, लेकिन फिर भी यह एक चैलेंज है। भारत छोड़िए, इससे पूरी दुनिया जूझ रही है। लोग अन्य देशों में बैठकर इंडिया में क्राइम करते हैं, तो वही इंडिया में बैठकर विदेशों में साइबर क्राइम करते हैं। तो ऐसे में उनको कैसे पकड़े। पहला क्राइम हुआ था, वो नाइजीरियन स्कैम, जिसमें ईमेल से अटैक होता था। वो नाइजीरिया से बैठे लोग करते थे। इसके लिए सबसे बड़ी जरूरत है कि जैसे यूएन है, वैसे ही एक फोरम बने, जिससे हम किसी भी देश में बैठे अपराधी को गिरफ्तार कर सकें और उस पर रोक लग सके।
सवाल: आपने बोस्निया और जॉर्जिया जैसे देशों में काम किया, कैसे देश का नेतृत्व किया?
जवाब: वो एक अलग ही अनुभव था। आप अपना काम नहीं दिखा रहे, बल्कि अपने देश का नेतृत्व कर रहे हो। जब हम भारत का झंडा पहनकर जाते हैं तो वहां के लोगों को दिखता है कि ये भारतीय पुलिस अफसर है। मुझे गर्व है, जब मैं बोस्निया गया था तो उस देश में शांति स्थापित करने के लिए उस मिशन में 42 देश के अधिकारी थे। उसमें हम सबसे ज्यादा बेहतर थे और डिमांड में भी थे। मुझे वहां ट्रेनिंग डिपार्टमेंट का मुखिया बनाया गया था। हमने वहां के एक राज्य की पूरी पुलिस को ट्रेन किया था। फिर मैं चीफ रिसर्च बना। मैं वहां रिसर्च करता था। तो हमने अपने देश का, पुलिस का, आईपीएस का, वर्दी का नाम रोशन किया। एक अलग अनुभव था। सबसे सीखने को मिलता है। भारत सरकार ने हमें एक मिशन पर साउथ अफ्रीका भी भेजा गया था। तो वहां एक देश में हम लोग गए थे, मैं उस मिशन का डिप्टी चीफ था। उस मिशन में भारत के पुलिस अधिकारी वहां कैसे सहयोग कर सकते हैं, उसके बारे में हमें स्टडी करना था। जब हम वहां लेसोथो गए तो वहां के राजा थे, उनसे हमें मिलने का मौका मिला। उन्हें हमने अपने भारत के मिशन के बारे में बताया। वो भी एक विचित्र अनुभव था, जो मुझे हमेशा याद रहेगा।
सवाल: आम जनता का पुलिस से दोस्ताना क्यों नहीं हो पा रहा… खुलकर क्यों नहीं आ पाता? ये तस्वीर कैसे बदलेगी?
जवाब: आज भी ऐसे लोग देश में हैं, जो खाकी वर्दी को देखकर गर्व महसूस करते हैं। जब रात में कोई जा रहा हो और खाकी पहनकर कोई खड़ा हो तो आपको सुरक्षा महसूस होती है। लेकिन कुछ समस्याएं कभी-कभी आती हैं। उसको दूर करने में हम निरंतर प्रयासरत रहते हैं। पुलिस आपकी है, आपकी भलाई के लिए है। अगर पुलिस में कोई कमी लगती है तो उसे बताएं, हम उसे दूर करने की पूरी कोशिश करेंगे।



