Minister Pratima Bagri : मंत्री जी का ‘झूठमेव जयते’? वो मेरा भाई नहीं…

Minister Pratima Bagri : सतना की राजनीति इन दिनों एक ऐसे विवाद के केंद्र में है, जिसने प्रदेश की युवा राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी की राजनीतिक साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सिर्फ पारिवारिक नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक जीवन की पारदर्शिता से भी जुड़ा है।
दरअसल, मंत्री प्रतिमा बागरी के सगे भाई अनिल बागरी को हाल ही में पुलिस ने गांजा तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया है। वह इस समय एनडीपीएस एक्ट के तहत सतना जेल में बंद हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि मंत्री प्रतिमा बागरी बार–बार सार्वजनिक मंचों पर अनिल को अपना भाई मानने से इनकार कर रही हैं।

परिवार के कई सदस्य जेल में
इस विवाद की परतें तब और गहरी होती हैं जब सामने आता है कि प्रतिमा बागरी का सिर्फ भाई ही नहीं, बल्कि अन्य निकट संबंधी भी नशे के अवैध कारोबार में फंसे हुए हैं। जीजा शैलेंद्र सिंह, जो प्रतिमा की बड़ी बहन प्रियंका बागरी के पति हैं, उन पर भी गांजा और कोरेक्स तस्करी से जुड़े कई मामले दर्ज हैं। शैलेंद्र सिंह फिलहाल उत्तर प्रदेश की बांदा जेल में एनडीपीएस एक्ट के मामले में बंद है। पुलिस जांच में शैलेंद्र सिंह का नाम अनिल बागरी के साथ एक ही नेटवर्क के रूप में सामने आया है। उन पर आरोप है कि दोनों मिलकर मादक पदार्थों की तस्करी करते थे।
मंत्री जी का दावा, वो मेरा भाई नहीं…
मंत्री द्वारा अपने ही भाई से पल्ला झाड़ने का दावा उस समय और संदिग्ध हो जाता है, जब पारिवारिक दस्तावेज और पुराने वीडियो इसके विपरीत तस्वीर दिखाते हैं। अनिल बागरी, स्व. जुगुल किशोर बागरी के भाई जीवन बागरी के बेटे हैं और प्रतिमा बागरी के जन्मजात सगे भाई। करीब छह महीने पहले वायरल वीडियो में प्रतिमा बागरी को अपने भाई अविनाश बागरी के घर हुए पारिवारिक समारोह में नाचते हुए देखा गया था। उसी वीडियो में अनिल बागरी भी मौजूद थे, जो यह साबित करता है कि पारिवारिक संबंध न सिर्फ वास्तविक हैं बल्कि सक्रिय भी हैं।
भाई को पहचानने से क्यों इनकार?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागरी परिवार में लंबे समय से राजनीतिक मतभेद रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि प्रतिमा बागरी के माता-पिता कांग्रेस से निकटता रखते थे, जबकि प्रतिमा अब भाजपा की मंत्री हैं। लेकिन इससे यह प्रश्न समाप्त नहीं होता कि मंत्री अपने भाई को पहचानने से इनकार क्यों कर रही हैं, जबकि प्रमाण खुलेआम मौजूद हैं।

सत्य से बचाव या सत्ता की ढाल?
मामला केवल रिश्ते का नहीं बल्कि उस राजनीतिक नैतिकता का है, जिसकी दुहाई अक्सर दी जाती है। क्या मंत्री अपने पद की रक्षा के लिए सत्य को दबा रही हैं? क्या सत्ता का प्रभाव उन्हें वास्तविकता से मुंह मोड़ने का साहस दे रहा है? या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति है ताकि परिवार पर उठते सवाल उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान न पहुंचा सकें? सतना से लेकर भोपाल तक यह मुद्दा अब चर्चा का केंद्र बन गया है, और प्रदेश की राजनीति में “सत्यमेव जयते” बनाम “झूठमेव जयते” की बहस तेज हो चुकी है।



